छत्तीसगढ़ की धरती जनजातीय समाज की धरोहर है तथा जल जंगल और जमीन इनकी पूंजी है अर्थात प्रकृति के उपासक जनजातीय समाज ने प्रकृति में परिवर्तन के अलग_अलग कालखंड को उत्सव के रुप में मनाकर समाज को प्रकृति से जोड़ने की अदभुत परंपरा आज भी कायम रखने का प्रयास उनकी अनुकरणीय पहल है। धान का कटोरा के रूप में प्रख्यात छत्तीसगढ़ में जब फसल खेतों से खलिहान और खलिहान से किसान की कोठी में आ जाता है तब उसकी खुशी को समाज के हर वर्ग में बांटने का पर्व का नाम ही छेर_छेरा है।
भारतीय पंचांग के अनुसार पौष माह के पूर्णिमा तिथि पर छेर_छेरा त्यौहार पर जहां समाज का अन्नदाता किसान के घरद्वार_आंगन में छोटा_बड़ा हर व्यक्ति *छेर_छेरा, कोठी के धान हेर_हेरा* के उद्घोष के साथ गांव_गली आंगन में गीत नृत्य के साथ झूमता नजर आता है, जिसमें महिलाएं सुआ नृत्य तथा पुरुष डंडा जैसे पारंपरिक लोकगीत एवं नृत्य के साथ सांस्कृतिक विरासत को आज भी संजोए हुए हैं।
यह पर्व प्रकृति पूजन के साथ ही सामाजिक समरसता और दानशीलता को आत्मसात करने का भी महा उत्सव है। यथा; हमारा किसान जहां अर्जित फसल के लिए प्रकृति को धन्यवाद स्वरूप उसकी पूजा करता है तो वहीं धान_राशि, वस्त्र आदि का दान कर समाज के प्रति अपने अपना योगदान सुनिश्चित करते हुए सामाजिक समरसता और एकता को कायम रखने प्रत्यक्ष _अप्रत्यक्ष रूप से पहल करता है।निश्चित रुप से छत्तीसगढ़ की धरती में प्रकृति पूजन की विशेष और अनिवार्य परंपरा है। देवांगन समाज के लोग भी इस अवसर पर माता शाकंभरी पूजन महोत्सव का आयोजन कर सामाजिक_ सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ सामाजिक भोज का आयोजन करते हैं।
इस प्रकार छेर_छेरा का पर्व भी प्रकृति और संस्कृति संरक्षण के प्रति आम छत्तीसगढ़िया के समर्पण के साथ सामाजिक समरसता, एकता और परस्पर सामाजिक सहभागिता तथा एकता को सुनिश्चित करने का पर्व है।
इस अवसर पर राष्ट्रीय मानवाधिकार एवं सामाजिक न्याय आयोग (विधि) के प्रदेश अध्यक्ष एवं उच्च न्यायालय अधिवक्ता चितरंजय सिंह ने छेर_छेरा पर्व पर बधाई देते हुए कहा कि आज जब भारतीय समाज में पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण का दौर है; तब राष्ट्र की पुरातन संस्कृति एवं परंपरा को संरक्षित करने छत्तीसगढ़िया समाज के इन पर्वों को प्रोत्साहित करने हमारे सरकार को भी पहल करना चाहिए। तभी हमारी संस्कृति, सभ्यता के साथ सनातन धर्म की रक्षा सुनिश्चित होगी जहां जल_ जंगल_ जमीन के साथ ही जीव_जंतुओं और नदी_पहाड़ आदि के पूजन की परंपरा आज भी कायम रहेगा और हम सब *वसुधैव कुटुंबकम्* के भाव से सुरक्षित और समृद्ध भारत की कल्पना को साकार कर सकेंगे।

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